Dhirubhai ambani Struggle story in Hindi|धीरुभाई अम्बानी जीवन परिचय

Dhirubhai ambani Struggle story in Hindi
Dhirubhai ambani Struggle story in Hindi

Dhirubhai ambani Struggle story in Hindi: नमस्कार दोस्तों आज हम आपके लिए एक ऐसी शख्सियत की प्रेरणादायी जीवनी लेकर आये है जिसके जीवनी की लोग मिसालें देते है जिसने यह साबित कर दिया कि जिंदगी में सफ़ल होने के लिए डिग्रियां कोई मायने नही रखती बल्कि उस इंसान में यह विश्वास होना चाहिए कि हां ‘मैं कर सकता हूँ’। एक ऐसा इंसान जिसने केवल अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की इसके बावजूद भी उसने अपना नाम विश्वभर के सफलतम व अमीर उद्योगपतियों की श्रेणी में दर्ज करवाया। जिसमे अपनी तमाम ज़िंदगी मे कई सारे उतार चढ़ाव देखे लेकिन यह आदमी कभी मुश्किलों के सामने नही झुका।


तो मित्रो हम बात कर रहे है RELIANCE कम्पनी के फाउंडर ‘धीरजलाल हीराचंद अम्बानी’ अर्थात धीरू भाई अम्बानी की। यह कहानी है धीरूभाई अम्बानी के साहस, दृढ़ता, मुश्किल परिस्थितियों में हार न मानने की व उनका अपने ऊपर अनन्त विश्वास की। 
आइये शुरू से शुरू करते है और जानते है Dhirubhai ambani Struggle story in Hindi किस तरह उन्होंने आज यह मुक़ाम हासिल किया है जंहा आज पहूंच पाना हर किसी के बस का नही है। 

पूरा नाम :‘धीरजलाल हीराचंद अम्बानी
उपनाम :धीरुभाई
पेशा :भारतीय उद्योगपति
जन्मतिथि ;28 दिसम्बर 1932 चोरवा,गुजरात
परिवार :पिता: हीराचंद गोर्धन भाई अम्बानी
माता:  जमनाबेन 
भाई: रमणिकलाल अंबानी, नटवरलाल
बहन: त्रिलोचना बेन, जसुमतिबेन
स्कूल :‘बहादुर कांजी हाई स्कूल
शैक्षणिक योग्यता :10th पास
पत्नी का नाम :कोकिलाबेन अम्बानी
बच्चे: मुकेश अंबानी (19 अप्रैल 1957)
अनिल अम्बानी (4 जून 1959)
दीप्ती स्ल्गाओकर (17 अक्टूबर 1961)
नीना कोठारी (21 जुलाई 1962)
मृत्यु:06 जुलाई 2002, मुंबई, भारत
पुरस्कार:साल 2016 में पद्म विभूषण (मरणोपरांत)


शुरुआती पढ़ाई, जन्म व परिवार:


एक साधारण परिवार में जन्मे धीरूभाई अंबानी का जन्म गुजरात के जूनागढ़ के समीप एक छोटे से गाँव चौरवाढ मे हुआ। जूनागढ़ वही शहर है जो एक समय हिन्दुस्तान से अलग ही रहना चाहता था. इनके पिताजी का नाम हीराचंद गोवर्धन भाई अम्बानी है जोकि अपने गांव में ही प्राइमरी स्कूल में शिक्षक के पद पर थे और उनकी माता जी का नाम जमनाबेन था जोकि गृहणी थी। इसके अलावा धीरूभाई अम्बानी कुल 5 भाई बहन है जिनमे इनके दो बड़े भाई रमणीक लाल और नटवर लाल है तथा दो छोटी बहनें त्रिलोचना व जसुमति थे।इतने बड़े परिवार का लालन पोषण करना उनके पिता के लिये बिल्कुल भी सरल नही था व उनकी नौकरी से घर का निकालना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था।धीरूभाई को बचपन मे ही आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा ऐसी परिस्थिति में धीरूभाई का पढ़ाई करना तो जैसे नामुमकिन सा था पर उन्होंने जैसे तैसे करके अपनी 10वी कक्षा की ‘बहादुर कांजी हाई स्कूल’ से पूरी की। इसके बाद इन्होने अपने घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए अपनी स्कूली पढाई को बिच में ही छोड़ दिया वह चाहते थे की वो घर की जिम्मेदारियों में पिता जी की मदद कर सके.

धीरूभाई अंबानी जी का निजी जीवन व उनका शादी के बंधन में बंधना:


धीरूभाई ने 1955 में गुजरात की कोकिलाबेन से शादी कर ली और उनके दो बेटे मुकेश अम्बानी व अनिल अंबानी है तथा उनकी दो बेटियां भी है जिनका नाम नीना कोठारी व दीप्ति सलगाओकर है। 

व्यवसायिक सफर का आस्म्भ:

आपको बता दे की धीरुभाई अम्बानी शुरुआत से ही बिजनेस करना चाहते थे. वो कहते है ना कि आप सफलता की सीढ़ी असफलता रूपी कपड़े पहनकर नही चढ़ सकते. जब धीरूभाई अम्बानी से स्कुल छोड़ा तो उन्होंने सबसे पहले अपने कदम बिजनेस की और ही बढाये और उन्होंने सबसे पहले फल और नाश्ता बेचने का बिजेनेस किया लेकिन उनको इसमें ज्यादा मुनाफा नही हुआ और उन्होंने यह काम छोड़ दिया लेकिन उन्होंने हार नही मानी और अपने ही गाँव में एक धार्मिक पर्यटन स्थल गिरनार में पकोड़े बेचने का काम शुरू किया उनको इस काम में कुछ हद तक सफलता भी मिली लेकिन उन्होंने इस काम को भी बंद कर दिया क्योंकि यह काम पूरी तरह से पर्यटकों पर ही निर्भर था जो साल के कुछ महीने ही चलता था। लगातार उनके बिज़नेस आइडिया को फ्लॉप होते देख उनके पिता ने उनसे कहा कि इस बिज़नेस में कुछ नही रखा है जाकर कंही और नौकरी करो।
यमन में पेट्रोल पंम्प पर भी कार्य किया.

Dhirubhai ambani Struggle story in Hindi


बिज़नेस में लगातार तो असफलताओ के बाद धीरूभाई ने पिता की बात मानी और नौकरी करने का सोचा। उन दिनों धीरूभाई के बड़े भाई रमणीक लाल यमन में नौकरी किया करते थे तो उनकी मदद से उन्हे भी यमन जाने का मौका मिला और उन्हें वँहा पर शेल कम्पनी के पेट्रोल पम्प पर 300 रुपये महीना पर नौकरी भी मिल गयी लेकिन उन्हें इसके लिए अंग्रेजी भाषा का आना भी जरूरी था तो इन्होंने अंग्रेजी भाषा को सुधारने के इंग्लिश ग्रामर की किताबें कि मैगज़ीन को पढ़ना शुरू कर दिया और महज 2 वर्षों के भीतर ही धीरूभाई अपनी लग्न व कड़ी मेहनत की बदौलत प्रबन्धक के पद पर भी पहूंच गए। लेकिन उनका दिमाग तो अभी भी बिज़नेस में ही था इस दौरान वो बिज़नेस करने का अवसर तलाशते रहते व विचार करते कि कैसे मैं एक सफ़ल बिज़नेस मैन बन सकता हूँ। शायद बिज़नेस के प्रति इसी पागलपन से उन्होंने अपना नाम विश्व के सफल उद्योगपतियो की सूची में दर्ज करवाया।


धीरूभाई के कुछ ऐसे किस्से भी है जो उनका बिज़नेस के प्रति जोश व जुनून बयां करते है।
दरसल यह किस्सा कुछ यूं है कि जब धीरुभाई पेट्रोल पंप पर कार्य करते थे तो उन दिनों सभी कर्मचारियों को हर रोज़ 25 पैसे की चाय मिलती थी लेकिन पेट्रोल पंप के साथ ही एक होटल हुआ करता जंहा पर बड़े बड़े व्यापारी ही चाय पीने जाते थे और वंहा पर चाय 1 रुपये की चाय मिला करती थी। कमाल की बात तो यह है कि धीरूभाई वो 25 पैसे की चाय छोड़कर 1 रुपये की चाय पीने जाते थे। कोई उनसे पूछता था कि तुम ऐसा क्यों करते हो तो उनका जवाब होता कि वँहा पर जो व्यापारी आते है वो वँहा बिजनेस से सम्बंधित बाते करते और में उनकी वही बाते सुनने जाता हूं। मेरे जो 1 रुपये हर रोज़ खर्च होते है वो चाय के लिए बल्कि इन्ही बातों के लिये होते है। इन्होंने अपने ही तरीके से बिजनेस की पढ़ाई की और आज बड़ी से बड़ी यूनिवर्सिटी के टॉपर्स भी इनकी कम्पनी में आने के लिए तरसते है।


धीरूभाई की योग्यता और उनका बिजनेस के प्रति पागलपन का अंदाज़ा इसी बात से भी लगता है दरसल उन दिनों यमन में चांदी के सिक्कों का प्रचलन था और धीरूभाई से रिसर्च करके पता लगाया कि इन सिक्कों से ज्यादा मूल्यवान तो यह चांदी है तो वे उन सिक्को को खरीदते और उन सिक्को को पिघलाकर उसके अंदर से सिल्वर को बेचते थे ऐसा करके वो अच्छी खासी रकम जोड़ चुके थे। 


यमन में आंदोलन का दौर शुरू:


धीरूभाई जब यमन में नौकरी कर रहे थे तो उस 1950 दौरान में यमन का ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आज़ादी के लिये आन्दोलन भी शुरू हो गए और वँहा के हालात इतने बिगड़ गए कि यंहा पर रह रहे लोगो के लिए व्यवसाय के सारे दरवाज़े भी बन्द होने लगे थे और साल 1952 में इनके पिता जी का निधन हो गया और 1954 में उनके लिए अच्छी बात यह हुई की शेल कम्पनी ने यमन (एडन) में ऑयल रिफाइनरी की नींव भी रख दी थी हालांकि अब यमन में आंदोलन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ ज़ोर पकड़ने लगे थे इन्ही संघर्षो के बीच धीरूभाई ने साल 1955 में शादी कर ली और इसके ठीक 2 साल बाद 19 अप्रैल 1957 को उनके बेटे मुकेश अम्बानी का जन्म हुआ लेकिन दिन प्रतिदिन यमन के हालात बिगड़ते ही जा रहे थे और यंहा पर रह रहे भारतीयों के लिये व्यवसाय के दरवाजे पूर्णरुप से बंद हो चुके थे और उन्हें वँहा उनका अपने परिवार के साथ रहना खतरे से कम नही था तो धीरूभाई ने भारत आने का निर्णय लिया और वे भारत लौट आए।

रिलायंस कमर्शियल कॉर्पोरेशन और रिलायंस टेक्सटाइल की शुरुआत:


धीरूभाई जब भारत लौट तो उन्होंने तय कर लिया था कि मैं बिज़नेस ही करूँगा लेकिन उनके पास व्यवसाय शुरू करने के लिए पर्याप्त पैसे नही थे। लेकिन धीरूभाई पीछे नही हटे और उन्होंने अपने चचेरे भाई चम्पक लाल दम्मानी को बिजनेस में अपना साझेदार बना लिया और उन्होंने चंपकलाल दम्मानी के साथ मिलकर पॉलिएस्टर धागे व मसालों का आयात-निर्यात करना शुरू कर दिया। कुछ दिनों तक बाज़ार की परिस्थितियों को करीब से देखने के बाद धीरूभाई को ज्ञात हो चुका था कि पॉलिएस्टर की मांग भारत मे ज्यादा है और मसालों की विदेशों मे और धीरूभाई अपने इस बिज़नेस का नाम  Reliance commercial and corporation रखते है.

Dhirubhai ambani Struggle story in Hindi


आपको बता दे कि धीरूभाई ने जब अपने बिज़नेस की शुरुआत मस्जिद बन्दर के नरसिम्हा स्ट्रीट पर एक छोटे से ऑफिस से की थी । आपको आश्चर्य होगा कि धीरूभाई के पास उस समय 350 वर्ग फुट का एक छोटा सा कमरा था जिसमे 1 टेबल 3 कुर्सी व उनके साथ काम करने वाले दो सहयोगी भी थे। मगर धीरूभाई उस समय खुद इस बात से अंजान थे कि भविष्य में वह इसी ऑफिस के माध्यम से लाखों लोगों को रोजगार देने वाले थे। इस व्यवसाय के शुरू में ही धीरूभाई को ज्ञात था कि बिज़नेस में अगर सफल होना है तो ग्राहको को खुश रखना जरूरी है तो उन्होंने मुनाफे से ज्यादा अपनी प्रोड्क्ट क्वालिटी पर ध्यान दिया। 


धीरूभाई में एक खतरनाक आदत यह थी कि वह बिज़नेस में कोई रिस्क लेने कतराते नही थे इसलिये इन्हें Risk Taker भी कहा जाता है। आपको बता दे कि धीरूभाई और चंपकलाल दम्मानी दोनों का स्वभाव और बिज़नेस करने का तरीका अलग था। धीरूभाई रिस्क लेने नही डरते उनका यही मन्त्र था कि अगर बिज़नेस में सफल होना है तो रिस्क लेना जरूरी है और दूसरी तरफ चंपकलाल दम्मानी थोड़े सतर्क व्यापारी थे और वे बाज़ार की गतिविधियों को जांच परखकर ही फैसले लेते थे इसी वजह से साल 1965 मे धीरूभाई ने चंपकलाल दम्मानी के साथ अपनी साझेदारी ख़त्म कर दी। और वे बल बुते पर ही बिज़नेस को आगे लेकर गए।


Reliance Textile की शुरुआत:


आपको तो ज्ञात ही है कि धीरूभाई में पारखी नज़र व अवसर भुनाने की क्षमता तो पहले से ही विद्यमान थी ही तो उन्होंने आगे चलकर फिर से रिस्क उठाते हुए सूत के कारोबार में अपना हाथ आजमाया हालांकि शुरुआत में इनको कठिनाइयों के दौर से गुजरना पड़ा पर उनकी ज़िद के आगे मुश्किलें भी टिक नही पाई और धीरूभाई को सूत व्यापारी संग़ठन का डायरेक्टर बना दिया गया और धीरूभाई ने इस संगठन में काम करने की कई बारीकियों को सीखा। अब धीरूभाई ने तय किया कि वह बाहर से सूत का आयात नही करेंगे बल्कि खुद की ही ‘टेक्सटाइल मिल’ खोलेंगे फिर इन्होंने 1966 में नरोदा मिल के नाम से अहमदाबाद में “Textile Meal” खोल दी   जिसमे “सिंथेटिक कपड़ा” बनाया जाएगा और उन्होंने इस मिल में बनने वाले कपड़े का नाम VIMAL रखा। अब आप सोच रहे होंगे कि इसका नाम विमल ही क्यों रखा दरसल अम्बानी ने यह नाम अपने बड़े भाई रमणीक लाल के बेटे पर रखा। विमल का अर्थ होता है मलरहित अर्थात शुद्घ। 

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धीरूभाई ने फिर से वही मार्केटिंग रणनीति बनाई जिसमे उन्होंने कस्टमर्स को सन्तुष्ट किया और उन्होंने कम लागत में क्वालिटी प्रोडक्ट तैयार किये जिससे उनकी जिससे जल्द ही उनका ब्रांड VIMAL घर घर मे लोकप्रिय होगा और कम्पनी अच्छा खासा मुनाफ़ा भी कमा रही थी लेकिन कुछ समय के बाद कम्पनी की उत्पाद की बिक्री में गिरावट आने लगी और कुछ समय बाद तो इनका माल बिकना ही बंद हो गया फिर धीरुभाई ने विचार किया कि कपड़े की क्वालिटी भी अच्छी है और दाम भी कम है तो ऐसा कैसे हो सकता। फिर उन्होंने रिसर्च की तो पता चला कि मार्किट में दुकानदारो के पास कई ब्रांड्स के विकल्प है लेकिन धीरूभाई ने इस समस्या से निपटने के लिए एक ऐसी रणनीति बनाई जो आपको दुनिया की किसी किताब में नही मिलेगी।

दरसल हुआ कुछ की धीरूभाई ने कुछ समय के लिये दुकानदारों को माल देने से मना कर दिया फिर उन्होंने अपने ही स्टाफ कर्मचारियों की टीम्स बनाई जोकि ग्राहक बनकर दुकानदारों के पास जाते और कहते रिलायंस का कपड़ा है जो कोई भी दुकान में आता बस यही पूछता फिर दुकानदारों को लगा कि मार्किट में रिलायंस के कपड़े की बहोत मांग है तो उन्होंने कम्पनी में माल के लिये आर्डर देना शुरू कर दिया। कपड़े की क्वालिटी तो लाजवाब थी ही जिस कारण कपड़ा मार्किट में धड़ाधड़ बिकने लगा और कम्पनी फिर से सफलता की पटरी पर दौड़ने लगी।
धीरूभाई की यह कम्पनी सफलता के नए आयाम लिख रही थी फिर 1975 में वर्ल्ड बैंक की टेक्नीशियन टीम भारत आती है जोकि इंडस्ट्रीज  की  निर्माण इकाई का कार्य देखती है और यह टेक्नीशियन टीम रिलायंस  इण्डस्ट्री का भी दौरा करती है और इसे विकसित देशों के मानकों में अच्छा बताती है।साल 1980 में धीरूभाई ने तमाम संघर्ष की कसौटियों पर खरा उतरकर  रिलायंस पॉलिएस्टर यार्न निर्माण के लिए सरकार से लाइसेंस भी प्राप्त किया। इसके बाद धीरूभाई लगातार सफलता की सीढ़ी चढ़ते गए.


इक्विटी कल्ट की शुरुआत:


आपको बता दे भारत मे इक्विटी कल्ट की शुरुआत करने का श्रेय भी धीरूभाई अंबानी को ही जाता है साल 1977 में रिलायंस ने सर्वप्रथम IPO (Initial Public Offering) जारी किया जिसमे करीब 58000 निवेशकों ने उसमे निवेश किया। जिसमे उन्होंने कहा कि जो भी उनकी कम्पनी में निवेश करेगा उसे केवल लाभ ही मिलेगा जिस कारण वो गुजरात व दूसरे राज्यो के ग्रामीणों को आश्वस्त करने में सफल रहे।


रिलायंस इंडस्ट्रीज का अलग-अलग क्षेत्रों में विस्तार:


ऐसा नही है कि धीरूभाई रिलायंस को आगे लेकर नही गए। आपको बता दे धीरूभाई ने रिलायंस का विस्तार अलग-अलग क्षेत्र जैसे पेट्रोलियम, टेलिकम्युनिकेशन, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, एनर्जी, टेक्सटाइल, कैपिटल मार्किट, इलेक्ट्रिसिटी शामिल है जिसमे उन्होंने अपना सिक्का जमाया। आपको बता दे कि जंहा धीरूभाई ने अपने ऑफिस की शुरुआत महज़ दो कर्मचारियों से की आज उनकी कम्पनी में 1,95,618 कर्मचारी काम करते है और केंद्र सरकार के पूरे टैक्स में 5% टैक्स अकेले रिलायंस ही देती है। साल 1985 में रिलायंस Reliance Textile का नाम बदलकर Reliance Industries Limited कर देता है। 

आरोप व आलोचनाओ के दौर से भी गुज़रना पड़ा:


जंहा पर धीरूभाई सफलता की सीढ़ी चढ़ रहे थे वन्ही उनको आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। उन पर आरोप लगे कि धीरूभाई अपनी जरूरतों के हिसाब से सरकारी नीतियों को बड़ी चालाकी से बदलवाते है। यंहा तक भी कहा गया कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी को सरकारी नीतियों के सहारे मात देते है और वो नुस्ली वाडिया के साथ घमासान को लेकर भी चर्चाओं में रहे हालांकि उन पर यह आरोप सत्य साबित नही हुए।


धीरूभाई का निधन:


वन्ही धीरूभाई अपनी कड़ी मेहनत व आत्मविश्वास के बदौलत लोगो की बीच मे मिसाल के रूप में उभरे और 6 जुलाई 2002 में इस महान हस्ती  ने दुनिया को अलविदा कह दिया। भले ही वो हमारे बीच नही है लेकिन आज भी युवाओ में उनके नाम की मिसाले दी जाती है और बॉलीवुड में उनसे इंस्पायर्ड ‘गुरु’ मूवी भी बनाई गई है।

धीरुभाई को प्राप्त सम्मान व उपलब्धियां:

धीरुभाई ने अपने कड़ी मेहनत व आत्मविश्वास के बदौलत रिलायंस जैसा साम्राज्य खड़ा कर दिया और उनके द्वारा किये गये कार्यो को भी सराहा गया जिसके चलते उन्हें कई पुरस्कारों से भी नवाज़ा गया.

  • साल 1997 में धीरुभाई को ‘नेशनल एनर्जी कंजर्वेशन’ अवार्ड से भी नवाजा गया आपको बता दे की धीरुभाई इससे पहले 3 बार यह अवार्ड जीत चुके है.1818
  • वर्ष 1998 में पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय द्वारा ‘डीन मैडल’ प्रदान किया गया।
  • – एशियावीक पत्रिका द्वारा वर्ष 1996, 1998 और 2000 में ‘पॉवर 50 – मोस्ट पावरफुल पीपल इन एशिया’ की सूची में शामिल।
  • साल 2000 में भारत में केमिकल उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए ‘केमटेक फाउंडेशन एंड कैमिकल इंजीनियरिंग वर्ल्ड’ द्वारा ‘मैन ऑफ़ द सेंचुरी’ का सम्मान भी प्राप्त हुआ
  • वर्ष 2001 में ‘इकनोमिक टाइम्स अवॉर्ड्स फॉर कॉर्पोरेट एक्सीलेंस’ के अंतर्गत ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड।
  • साल 1999 में धीरुभाई को बिजनेस इंडिया-बिजनेस मैन ऑफ द ईयर से भी नवाज़ा गया.
  • – एशियन बिज़नस लीडरशिप फोरम अवॉर्ड्स 2011 में मरणोपरांत ‘एबीएलएफ ग्लोबल एशियन अवार्ड’ से सम्मानित हुए.
  • 18 अक्टूबर 2007 को रिलायंस इंडस्ट्रीज 100 बिलियन डॉलर बाज़ार पूंजीकरण करने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी.
  • सितम्बर 2008 में रिलायंस इंडस्ट्रीज भारत की पहली ऐसी कंपनी बनी जिसे फोर्ब्स की सूची में 100 सबसे बेहतरीन कम्पनियों में शामिल किया गया.
  • रिलायंस इंडस्ट्रीज को फेडरेशन ऑफ़ इंडियन चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) द्वारा ‘मैन ऑफ 20th सेंचुरी’ घोषित किया गया.

धीरुभाई अम्बानी के प्रेरनादायी विचार:

धीरुभाई का सम्पूर्ण जीवन और उनके द्वारा कहे गये प्रेरनादायी विचार जो आज लाखों करोड़ो युवाओं का मार्गदर्शन करते है आइये तो पढ़ते है कुछ ऐसे ही प्रेरनादायी विचार जो आपकी जिंदगी बदलकर रख देंगे.

  • बड़ा सोचे, तेजी से सोचे और सबसे आगे सोचे क्युकी विचारों पर किसी का एकाधिकार नही है.
  • फायदा कमाने क लिए किसी निमन्त्रण की जरूरत नही होती.
  • रिलायंस में विकास की कोई सीमा नही है- मैं हमेशा अपना विजन दोहराता रहता हूँ, सपने देखकर ही आप उन्हें पूरा कर सकते है.
  • कठिन समय में भी अपने लक्ष्य को मत छोड़िये और विपत्ति को अवसर में बदलिए.
  • समय सीमा में काम खत्म कर लेना काफी नही है,मैं समय से पहले काम खत्म होने की अपेक्षा करता हूँ.
  • यदि आप गरीबी में पैदा हुए तो यह आपकी गलती नही है यदि आप गरीबी में मर जाते है तो यह आपकी गलती है.
  • मुझे न शब्द सुनाई ही नहीं देता.
  • युवा शक्ति बड़ा परिवर्तन कर सकती है, उन्हें अवसर दीजिए, वे अनंत उर्जा के स्रोत हैं.
  • जब आप कोई सपना देख सकते है तो उसे साकार भी कर सकते है.
  •  यदि आप व्यवसायी है तो तभी आप सफल हो सकते है जब आप जोखिम लेना जानते है.

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